2. भारत में संस्कृति संगम
सारांश: रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित 'भारत में संस्कृति संगम' निबंध में ऐतिहासिक और विभिन्न जाति समूहों और परिस्थितियों के बारे में विवरणात्मक विश्लेषण विचार प्रस्तुत किया हुआ है । लेखक का मानना है कि भारतवर्ष में द्रविड़ लोग रहने के पूर्व हमारे देश में नीग्रो और ऑस्ट्रिक जाति के लोग निवास करते थे । जिसकी पीढ़ी आज वनों में रहती है । केवल अनुमान के बल पर हम जानते हैं कि आर्यों के आने के पूर्व इस देश में जो लोग बसते थे वे सभ्य थे । वे नगर सभ्यता के स्वामी थे और उनके धर्म का भी विकास हो चुका था। इन्हीं आर्य पूर्व भारत वासियों के नगरों का पुरंदर नामक आर्य ने विध्वंस किया । आर्य जब इस देश में बस गए और द्रविड़ जनता के साथ उनका संबंध दृढ़ हो गया तब उस संस्कृति को हिंदू या भारतीय संस्कृति कहते हैं।
सभी नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि वेद और उपनिषद हमारे देश की प्राचीनतम विधाएं हैं । संस्कृति का विकास एक प्रक्रिया है। आर्य और द्रविड़ जब मिलकर समाज के अंग बन गए तब उनके आचार विचार, आदतें और रिवाज भी मिश्रित होने लगे । और इससे जो धर्म निकला वहीं भारत का सनातन धर्म और जो संस्कृति निकली वही भारत की बुनियादी संस्कृति हुई।
आर्यों के आगमन के बाद से लेकर मुस्लिम विजय के पूर्व तक यूनानी, मंगोल, शक, कुशान, हूण आदि जो भी जातियां भारत में आकर बस गए उन सब का कुछ ना कुछ योगदान यहां की संस्कृति को मिला होगा।
लेखक की धारणा है कि शिव की पूजा आर्यों की चलाई हुई नहीं है। वह इस देश में पहले से ही प्रचलित थी। जब आर्य और आर्योत्तर जातियां समन्वित हुई तब उनकी रुद्र और शिव संबंधी कल्पनाएं एकाकार हो गई। जिसके परिणाम स्वरूप शैव धर्म की परंपरा प्राप्त हुई इससे स्पष्ट होता है कि हमारा धर्म और संस्कृति अनेक स्त्रोतों से मिलकर आगे बढ़ी है।
संस्कृति का स्वभाव आदान-प्रदान से बढ़ता है । जो जाति केवल देना जानती हैं लेना नहीं उसकी संस्कृति मिट जाती है । हमने यूनानीयों को दर्शन सिखाया बदले में हमने ज्योतिषी सीखी। आज हम जिन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय कहते हैं वह भारतवर्ष में ही जन्मे हैं यहीं से पहले अरब गए और अरब के द्वारा ही यूरोप को प्राप्त हुए थे। छुआछूत की भावना संस्कृतियों को ले डूबता है। प्राचीन भारत को आसपास की दुनिया में जगतगुरु समझा जाता था किंतु साथ वह जगत शिष्य भी था। हमें दूसरों को शिक्षा देनी है और दूसरों से शिक्षा लेने भी चाहिए यही भावना संस्कृति को सुरक्षित रखती है।
विशेषताएं: 1.दिनकर की रचनाओं में जीवन के विविध पहलुओं का चित्रण है ।
2. उनकी रचनाएं पाठकों में नया उत्साह, उमंग संचालित करती हैं ।
3.संस्कृति के चार अध्याय नामक ग्रंथ उनके इतिहास और संस्कृति संबंधी दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं।
संदर्भ सहित व्याख्याएँ
1. "यह इतनी सघनता से संपन्न हुआ कि अभी जांचने का कोई उपाय नहीं है कि हमारी संस्कृति का कौन अंश किस जाति की देन है तथा कौन विचार किसके साथ आए थे। "
लेखक परिचय: यह उद्धरण दिनकर जी के 'भारत में संस्कृति संगम' पाठ से लिया गया है । दिनकर जी का जन्म 1908 में बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था । उन्हें पद्म भूषण की उपाधि मिली। उनकी मुख्य रचनाएं हैं ओंकार रसवंती कुरुक्षेत्र रश्मिरथी उर्वशी महाकाव्य माना जाता है इसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
संदर्भ : भारतीय संस्कृति का उद्भव और विकास और अनेक जातियों का चित्रण लेखक ने इस पाठ में व्यक्त किया है।
व्याख्या: आर्य और द्रविड़ लोगों के आचार विचार, आदतें और रिवाज़ों के मिश्रण से सनातन धर्म का उदय हुआ। जो भारत की बुनियादी संस्कृति है। दूसरी संस्कृतियों के भी अनेक लोग आकर भारतीय संस्कृति इतने घुल मिल गए कि उनको अब अलग करना मुश्किल है । सभी जातियों का मिश्रण इस संस्कृति में हो गया।
विशेषताएं: भारतीय संस्कृति की महानता के बारे में लेखक ने बताया है ।
2.उनकी भाषा में उमंग उत्साह संचालित होता है।
3. यह पाठ उनकी इतिहास और संस्कृति संबंधी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
2. "जो जाति केवल देना ही जानती है लेना कुछ भी नहीं उसकी संस्कृति का एक दिन दिवाला निकल जाता है। "
लेखक परिचय: यह उद्धरण दिनकर जी के 'भारत में संस्कृति संगम' पाठ से लिया गया है। दिनकर जी का जन्म 1908 में बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था। उन्हें पद्म भूषण की उपाधि मिली। उनकी मुख्य रचनाएं हैं- ओंकार, रसवंती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी। उर्वशी महाकाव्य माना जाता है। इसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
संदर्भ: भारतीय संस्कृति का उद्भव और विकास और अनेक जातियों का चित्रण लेखक ने इस पाठ में व्यक्त किया है।
व्याख्या: भारतीय संस्कृति अनेक जातियों और धर्म का मिश्रण है। संस्कृति की विशेषता
उसके आदान-प्रदान में हैं। यदि कोई संस्कृति कभी देना नहीं जानती केवल लेना जानती हैं ऐसी संस्कृति धीरे-धीरे मिट जाती है। उसकी कोई महानता नहीं रहती। दूसरे देशों को हमें सिखाना है और उनसे हमें सीखना है। यही देश के लिए आवश्यक है।
विशेषताएं: 1. भारतीय संस्कृति की महानता के बारे में लेखक ने बताया है।
2. उनकी भाषा में उमंग उत्साह संचालित होता है।
3. यह पाठ उनकी इतिहास और संस्कृति संबंधी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
3. "प्राचीन भारत में आसपास की दुनिया में जगत शिष्य भी थे।"
लेखक परिचय: यह उद्धरण दिनकर जी के 'भारत में संस्कृति संगम' पाठ से लिया गया है। दिनकर जी का जन्म 1908 में बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था। उन्हें पद्म भूषण की उपाधि मिली। उनकी मुख्य रचनाएं हैं ओंकार रसवंती कुरुक्षेत्र रश्मिरथी उर्वशी महाकाव्य माना जाता है इसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
संदर्भ: भारतीय संस्कृति का उद्भव और विकास और अनेक जातियों का चित्रण लेखक ने इस पाठ में व्यक्त किया है।
व्याख्या: भारतीय संस्कृति में अनेक जातियों की संस्कृतियां मिल गई है। इस सांस्कृतिक विशेषता के कारण हमारा प्राचीन भारत आसपास की सभी देशों के लिए जगतगुरु समझा जाता था। किंतु उसे जगत शिष्य भी बनना चाहिए। क्योंकि हमें दूसरों को शिक्षा देनी है और दूसरों से सीखना भी चाहिए । तभी देश की उन्नति हो सकती है।
विशेषताएं:1.भारतीय संस्कृति की महानता के बारे में लेखक ने बताया है ।
2.उनकी भाषा में उमंग उत्साह संचालित होता है।
3. यह पाठ उनकी इतिहास और संस्कृति संबंधी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
अभ्यास प्रश्न:
1. भारत में संस्कृति संगम निबंध की विषय वस्तु संक्षेप में लिखिए।
Ans रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित 'भारत में संस्कृति संगम' निबंध में ऐतिहासिक और विभिन्न जाति समूहों और परिस्थितियों के बारे में विवरणात्मक विश्लेषण विचार प्रस्तुत किया हुआ है । लेखक का मानना है कि भारतवर्ष में द्रविड़ लोग रहने के पूर्व हमारे देश में नीग्रो और ऑस्ट्रिक जाति के लोग निवास करते थे । जिसकी पीढ़ी आज वनों में रहती है । केवल अनुमान के बल पर हम जानते हैं कि आर्यों के आने के पूर्व इस देश में जो लोग बसते थे वे सभ्य थे । वे नगर सभ्यता के स्वामी थे और उनके धर्म का भी विकास हो चुका था। आर्य जब इस देश में बस गए और द्रविड़ जनता के साथ उनका संबंध दृढ़ हो गया तब उस संस्कृति को हिंदू या भारतीय संस्कृति कहते हैं।
सभी नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि वेद और उपनिषद हमारे देश की
प्राचीनतम विधाएं हैं । संस्कृति का विकास एक प्रक्रिया है। आर्य और द्रविड़ जब मिलकर समाज के अंग बन गए तब उनके आचार विचार, आदतें और रिवाज भी मिश्रित होने लगे । और इससे जो धर्म निकला वहीं भारत का सनातन धर्म और जो संस्कृति निकली वही भारत की बुनियादी संस्कृति हुई।
संस्कृति का स्वभाव आदान-प्रदान से बढ़ता है । जो जाति केवल देना जानती हैं लेना नहीं उसकी संस्कृति मिट जाती है ।हमें दूसरों को शिक्षा देनी है और दूसरों से शिक्षा लेने भी चाहिए यही भावना संस्कृति को सुरक्षित रखती है।
2. भारतीय संस्कृति की क्या विशेषताएं हैं?
Ans. भारतीय संस्कृति समन्वय की संस्कृति है। आर्यों के आगमन के बाद से लेकर मुस्लिम विजय के पूर्व तक यूनानी, मंगोल, शक, कुशान, हूण आदि जो भी जातियां भारत में आकर बस गए उन सब का कुछ ना कुछ योगदान यहां की संस्कृति को मिला होगा। हमारा धर्म और संस्कृति अनेक स्त्रोतों से मिलकर आगे बढ़ी है। संस्कृति का स्वभाव आदान-प्रदान से बढ़ता है। हमने यूनानीयों को दर्शन सिखाया बदले में हमने ज्योतिषी सीखी। आज हम जिन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय कहते हैं वह भारतवर्ष में ही जन्मे हैं यहीं से पहले अरब गए और अरब के द्वारा ही यूरोप को प्राप्त हुए थे।प्राचीन भारत को आसपास की दुनिया में जगतगुरु समझा जाता था किंतु साथ वह जगत शिष्य भी था। हमें दूसरों को शिक्षा देनी है और दूसरों से शिक्षा लेने भी चाहिए । यही भावना संस्कृति को सुरक्षित रखती है।
3. भारत की बुनियादी संस्कृति कैसे बनी है?
Ans. आर्यों के देवता पुरंदर ने आर्य पूर्व भारत वासियों के नगरों का विध्वंस किया। आर्य देश में बस गए और द्रविड़ जनता के साथ उनके संबंध दृढ़ हो गये तो संस्कृति का बुनियादी रूप तैयार होने लगा। इसे ही हम हिंदू या भारतीय संस्कृति कहते हैं। जब आर्य और द्रविड़ मिलकर एक समाज के अंग बन गए, तब उनके आचार विचार आदतें और निवास भी परस्पर मिश्रित होने लगे । और इस मिश्रण से जो धर्म निकला वही भारत का सनातन धर्म एवं जो संस्कृति निकली वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी।
4. भारतीय संस्कृति किन-किन जातियों की संस्कृतियों के समन्वय से बनी है?
Ans. भारतवर्ष के इतिहास में हमें यह मिलता है कि द्रविड़ पहले और आर्य बाद में आए थे। और द्रविड़ के भी पूर्व नीग्रो और ऑस्ट्रिक जातियों के लोग यहां बसे थे । जिनकी पीढ़ियां
आज वनों में रहती हैं। आर्यों के आगमन के बाद से लेकर मुस्लिम विजय के पूर्व तक कई लोग इस देश में आए वह सब हिंदू बनकर भारतीय जन समुद्र में डूबते चले गए।उनके साथ जो आदतें और विश्वास, रस्म और रिवाज़ आये वह भी भारतीय संस्कृति के अंग बन गए।भारतीय संस्कृति किसी एक जाति की रचना नहीं है। उनमें भारत में आकर यहां बस जाने वाली अनेक जातियों के अंश है।
5. भारतीयों ने विदेशियों को क्या दिया और उनसे क्या लिया?
Ans. संस्कृति का स्वभाव आदान-प्रदान से बढ़ता है। जो जाति केवल देना ही जानती है लेना कुछ भी नहीं उसकी संस्कृति मिट जाती है। जब भारतवर्ष सचमुच महान था तब वहां की लोक संस्कृति के क्षेत्र में धर्म की भावना से पीड़ित नहीं थे । अन्य जातियों से ज्ञान ग्रहण किया। यूनानीयों को हमने दर्शन सिखाया और बदले में उनसे हमने ज्योतिषी सीखी। हमने अरबों से भी ज्योतिष की बहुत सी बातें ग्रहण की इसमें से सर्वप्रथम मास्को और वर्षफल की पद्धति है । बदले में हमने अरबों को और फिर उनके द्वारा यूरोप को गणित और दर्शन की बातें सिखाई। आज हम जिन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय कहते हैं यह असल में भारतवर्ष में जन्मे थे। यहीं से वे पहले अरब गए और अरब के द्वारा ही यूरोप को प्राप्त हुए ।
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