विनय - बाल वर्णन - सूरदास
कवि परिचय :
यह माना गया है कि सूरदास का जन्म संवत् 1535 स्थिर किया गया है। कुछ विद्वानों के मतानुसार उनका जन्म सीही नामक ग्राम में और कुछ अन्य के अनुसार रुनकता नामक
ग्राम में हुआ। कुछ के अनुसार वे जन्मांध थे, किंतु कुछ विद्वान उनके द्वारा किये गये विविध सूक्ष्म वर्णन को देखकर उन्हें
बाद में अंधा हुआ मानते है। कृष्णभक्ति धारा में सूरदास सर्वाधिक महत्वपूर्ण और शिष्ट
है। इनके द्वारा रचित सवा लाख पदों के मुख्य विषय कृष्ण की बाललीला और रासलीला,भ्रमर गीत और विनय है। ब्रज भाषा में रची इनकी रचनाओं में प्रमुख और प्रामाणिक रचना ‘सुरसागर’ है।
सूरदास का देहांत परासौली नामक स्थान पर संवत् 1640 के लगभग हुआ माना जाता है।
ज: सूरदास जी कहते
हैं की श्री कृष्णा अभी बहुत छोटे हैं और आंगन में घुटनों के बल ही चल पाते हैं। एक
दिन उन्होंने ताजा निकला मक्खन एक हाथ में लिया और लीला करने लगे। श्री कृष्ण के छोटे
से एक हाथ में ताजा मक्खन शोभायमान है और वह उस मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे
हैं। उनके शरीर पर रेनू (मिट्टी का रज) लगी है। मुख पर दही लिप्टा है, उनके गाल सुंदर तथा आँखें विशाल हैं। माथे पर गोरोचन
का तिलक लगा है। बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं। जब वह घुटनों के बल मक्खन लिए हुए चलते
हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे भ्रमर मधुर रस को पी कर मतवाले हो गए हैं।
उनके इस सौंदर्य की अभिवृद्धि उनके गले में पड़े कंठहार (सिंह का नाखून) से और बढ़
जाती है। सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण के इस बाल रूप का दर्शन यानी एक पल के लिए
भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाता है। अन्यथा सारा जीवन ही निरर्थक ही है।
कन्हैय्या किलकारी मारता घुटनों के बल चला रहा है। श्री नंद
जी के मणिमय आंगन में वह अपना प्रतिबिंब पकड़ने दौड़ रहा है। श्याम कभी अपने प्रतिबिंब
को देख कर उसे हाथ से पकड़ना चाहता है। किलकारी मारकर हंसते समय उसकी दोनों दाँतें
बहुत शोभा देती है, वह बार-बार उसी (प्रतिबिंब) को पकड़ना चाहता है। स्वर्ण भूमि पर हाथ और चरणों
की छाया ऐसी पड़ती है कि यहां एक उपमा (उसके लिए) शोभा देने वाली है कि मानव पृथ्वी (मोहन के) प्रत्येक पद पर प्रत्येक मणि में कमल प्रकट करके उसके लिए (बैठने को) आसान सजाती है। बाल कृष्ण के विनोद को देखकर माता
यशोदा बार-बार श्री नंद जी को वहां (वह आनंद देखने के लिए) बुलाती है। सूरदास
के स्वामी को (मैया) अंचल के नीचे
लेकर ढक कर दूध पिलाती है।
ज: सूरदास का परिचय:
हिन्दी साहित्यकार के सूर्य महात्मा सूरदास सगुण
भक्त धारा की कृष्ण शाखा के श्रेष्ट कवि है। अनेक मध्ययुगीन कवियों की भांति इनका भी
प्रमाणिक जीवन - वृत्त नहीं प्राप्त है। इनके जन्म-काल, जन्म-स्थान तथा व्यक्तिगत
जीवन के संबंध में विद्वानों में एकता नहीं थी। डॉ. श्यामसुंदर दास सूरदास जी का जन्म सन् 1540 मानते हैं। परंतु डॉ. दीनदयाल गुप्त
जी ने उनका जन्म काल संवत 1635 सिद्ध किया है।
डॉ. श्यामसुंदर दास उनका जन्म स्थान 'सीही' ग्राम मानते है। कुछ विद्वान उन्हें चंदबरदाई के
वंशज भाट मानते है।
जनता का यह विश्वास
है कि सूरदास जन्मांध थे। कुछ लोगों का यह मानना था कि वे बाद में अंधे हुए। सूरदास
दरिद्रता तथा कुछ अन्य कारणों से घर छोड़कर सीही से चार कोस दूर स्थित एक गाँव के तालाब
के किनारे एक पेड़ के नीचे जाकर रहने लगे। वहां वे ज्योतिष बनकर शकुन बताने लगे जो
ठीक निकलते थे। इससे वे प्रसिद्ध हुए और 'स्वामी' कहलाए। कुछ ही दिनों में वे ज्योतिष की मिथ्या प्रतिष्ठिता के जाल को छोड़कर स्थायी
रूप मे रहने लगे।
गुरु शिष्य का अनुराग:
गुरुघाट पर वल्लभाचार्य के आने की सूचना पाकर सूरदास
ने उनसे भेंट की। वल्लभाचार्य ने पहले ही सूरदास के गायन की बात सुन रखी थी। इसलिए
उन्होंने सूर को भगवद यश वर्णन करने के लिए कहा। सूर ने विनय भाव से गाया।
वल्लभाचार्य को उसमें सूर का घिघियाना पसन्द नहीं
आया। उन्होंने भगवदलीला वर्णन करने को कहा। सूर ने अपने अनभिज्ञता बताया और उनकी शरण
में आए।
रचनाएँ:
सूरदास जी के नाम पर लगभग 26 पुस्तकों के नाम दिए गए हैं। परंतु "सूरसागर" और "साहित्य लहरी" ही उनकी श्रेष्ठ कृतियां हैं। "सूरसागर" में कृष्ण-कथा वर्णित है। "साहित्य लहरी" में दुष्ठकूट पद है। इनमे राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अती गोपन शैली में किया गया है।
सूरदास का अनोखा वर्णन:
सूरदास वात्सल्य तथा शृंगार के वर्णन में अद्वितीय
है। सूरदास के पहले किसी कवि ने वात्सल्य-वर्णन को अपने
काव्य का विषय नहीं बनाया है। इस लिए कूछ विद्वानों का यह कहना सच ही है कि सूर ही
वात्सल्य है और वात्सल्य ही सूर है। वे वात्सल्य रस का कोना-कोना झाँक आए हैं। बाल
कृष्ण का सोना-जागना, मक्खन रोटी खाना, घुटनों पर चलना, तोतली भाषा बोलना, मिट्टी खाना, माता यशोदा से झूठ बोलना, बलराम भैया से झगड़ना, ग्वाल बालों के
साथ रूठ जाना आदी का मार्मिक वर्णन सूर ने किया है। मक्खन चोरी लीला के प्रसंग में
बालकृष्ण द्वारा माता यशोदा से पूछा गया यह प्रश्न कितना स्वभाविक है, देखिये - मैया कबाहि बढ़ेगी चोटि?
सूरदास विप्रलंभ वात्सल्य के चित्रण में भी बेजोड़
हैं। यशोदा देवकी को अपने संदेश में कृष्ण के स्वभाव, चेष्टाओं आदि से संबंधित जानकारी देती है ताकि वहां देवकी द्वारा कृष्ण को
कोई कष्ट न हो। यह यशोदा के पुत्र-प्रेम का परिचायक
है। सूरदास ने बालकृष्ण के रूप-सौंदर्य का सुन्दर
वर्णन किया है।
सूरदास ने वियोग-वर्णन मनोवैज्ञानिक पृष्टभूमि के आधार पर किया है। उन्होंने विरह-वर्णन में कृष्ण संबंधित वस्तुओं (ब्रजभूमि की प्रकृति, यमुना नदी, बाल ग्वाल, गोपियाँ, राधा, यशोदा आदि) को स्थान दिया। भ्रमर गीत प्रसंग में सूर ने गोपियों की विरह-व्यथा का प्रभावोत्पादक वर्णन किया है।
विनय सारांश:
श्रीकृष्ण ही जीव की और यहां समस्त सृष्टि की आत्मा
होने से एक मात्र आश्रय है। जैसे दरिया में तैरते जहाज पर बैठा पंछी मन की चंचलता से
उड़ता तो है पर मध्य दरिया में उसे कहीं और आश्रय नहीं मिलता, वह फिर आकर जहाज पर बैठ जाता है। जीव भी इस संसार रूपी सागर में अपनी विषयासक्ति
के कारण यहां वहां भटकता है पर आत्मा श्री कृष्ण होने से उसे कहीं दूसरे विषय मे मन
स्थायीरूप से लगता नहीं भटकता रहता है। कमल नयन श्री कृष्ण को पहचाने बिना जो अन्य
का भजन करते है वे तो ऐसे मूढ़ है ,जो पास बहती गंगा को छोड़ कर कुँआ खोद कर प्यास बुझाने
का सोचते है। भंवरा कमल का रस चख ले तो कभी करेले जैसे कडवे फल को चाखेगा कभी? नहीं। सूरदास जी कहते हैं कि कामधेनु को छोड़ मुर्ख ही होगा जो बकरी को दोहेगा?
यहां भक्त की
भगवान के प्रति अनन्यता की ऊंची आस्था दिखाई गई है। जीवात्मा परमात्मा की अंश स्वरूप
है। उसका विश्रांति-स्थल परमात्माही है, अन्यत्र उसे सच्ची सुख-शांति मिलने की
नहीं। प्रभु को छोड़कर जो इधर-उधर सुख खोजता
है, वह मूढ़ है।
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