साखी {कबीर दास}
कवि परिचय :
कबीर (लगभग 1399-1495 ई.) अपने समय के उच्चकोटि के संत और क्रांतिकारी समाज सुधारक थे । कबीर दास निरक्षर थे। उनके गुरु रामानंद थे। कबीरदास की भाषा साधुक्कड़ी थी । वे सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक बाह्य आडंबरो के प्रबल विरोधी थे। वे समाज में व्याप्त किसी भी संप्रदाय को खंडन करने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं थे ।
1Q. कबीरदास के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
ज. कबीर दास जी का जन्म सन् 1399 में काशी में हुआ था। वे जन्मतह हिंदू थे। और इनका पालन-पोषण मुसलमान परिवार में हुआ। इनके गुरु रामानंद थे, उनकी पत्नी का नाम लोई और इनके दो संतान - कमल, कमाली है। इनका मृत्यु मगहर में सन् 1495 में हुई।
कबीरदास अक्खड़ प्रवृत्ति के साधु थे। वे राजा-महाराजा, विद्वानों के सामने अपने को कम नहीं समझते थे। लेकिन किसी फ़कीर के आगे अपने आप को बहुत कम समझते थे। वे एक सच्चे समाज सुधारक थे। उनका विश्वास साकार रूपी भगवान में ना होकर निराकारी भगवान में था। इसलिए समाज में प्रचलित धार्मिक आडंबरों का खंडन करते थे। उनके समय में समाज में फैले हुए धार्मिक एवं सामाजिक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करते थे। वे अनपढ़ थे । किसी भी आश्रम में उन्हें उन्होंने शिक्षा प्राप्त नहीं की लेकिन संसार रुपी जीवन के विश्वविद्यालय से उन्होंने अनुभव को प्राप्त किया है । तथा साधु जनों के संगति और देशाटन से वे पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किए हैं। इनके दोहे "बीजक" नामक ग्रंथ में संग्रहित हैं जिसके तीन भाग हैं - साखी, शब्द, रमैणी। इनकी भाषा साधुक्कड़ी भाषा है। इनके दोहों में अनुभूति की सच्चाई और भाव - प्रवणता मिलती हैं लेकिन कला की कारीगरी नहीं मिलती।
2Q. मूर्ति पूजा के प्रति कबीरदास का विचार क्या है?
ज: कबीरदास हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के निर्गुण भक्तिधारा के ज्ञानाश्रयी शाखा में के प्रमुख कवि थे। इनकी उपासना निराकारी भगवान में थी। वे जन्मतः हिंदू, एवं पालन-पोषण से मुसलमान थे। वे किसी भी धर्म के मुढविश्वासों को तथा धार्मिक अडंबरों को खंडन करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं करते थे। उनका विचार है कि - धार्मिक अडंबरों से या अंधविश्वास से भगवान की उपासना नहीं हो सकती है। वे निराकार रूप में भगवान में विश्वास करते थे। जिस भगवान का रंग-रूप तथा आकार कुछ भी नहीं है। इसीलिए मूर्ति पूजा को वे खंडन करते हैं। लोग पत्थर की पूजा करते हैं,जिसे वे भगवान समझते हैं। तो कबीरदास पहाड़ की पूजा करेंगे जिससे पत्थर से भी बड़ा भगवान मिल सके। लेकिन इससे भी चक्की अच्छी है, जो उसी पत्थर से बनी है। लोग इससे आटा पीस कर खाते हैं।
कबीरदास इसी तरह बाह्य आडंबरों के प्रति व्यंग्य रूप से खंडन करते हैं। उनका मानना है कि भगवान को आकार से नहीं, आडंबर से नहीं, बल्कि मन से एकाग्रता के साथ एवं श्रद्धा के साथ उपासना करना चाहिए।
3Q. कबीर का रहस्यवाद पर एक टिप्पणी लिखिए।
ज: कबीरदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। वे एक संत, साधु के रूप में निराकर भगवान के उपासना की पद्धति को श्रद्धा दी है। इनके अनुसार भगवान निराकारी होते हैं। सर्वव्यापी होता है। जिसको ज्ञान के द्वारा ही ढूंढा जा सकता है। अन्यथा वे किसी भी पद्धति में, उपासना में, पूजा में विश्वास नहीं रखते है। अज्ञान, निराकारी, सर्वव्यापी भगवान की खोज करना और उसे पहचानने को 'रहस्यवाद' कहते हैं। कबीरदास एक श्रेष्ठ रहस्यवादी कवि थे। फिर भी कभी-कभी ईश्वर से बढ़कर गुरु को मान्यता देते हैं क्योंकि ईश्वर को पहचानने का मार्ग गुरु से ही प्राप्त होता है।
एक दोहे में वे कहते हैं की - कस्तूरी मृग सुगंध को ढूंढते हुए जंगल और मैदानों में भटकता रहता है। उसे पता नहीं चलता कि वह सुगंध उसी के नाभि से निकलता है। इसी तरह लोग भगवान को ढूंढते हुए कई तरह के आचरण एवं रीति-रिवाज़ों का पालन करते हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं चलता कि भगवान उन्हीं की मन में अंतर्निहित है।
कबीरदास गर्व को दूर करने की बात कहते हैं क्योंकि-मन में अहंकार होगा तो गुरु (भगवान) को स्थान नहीं मिलेगा। अहंकार छूटने पर ही गुरु की प्राप्ति (भगवान) हो सकती है,इसी तरह जीवन के बारे में कहते हैं कि
यह पानी के बुदबुदा के समान है, अशाश्वत है। यह कब समाप्त हो जाएगा इसकी जानकारी नहीं है। इसीलिए व्यर्थ विषयों को छोड़कर जीवन को मूल्यवान बनाना चाहिए।
4Q. प्राचीन रीति-रिवाजों को कबीरदास ने कैसे खंडन किया?
ज: कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। वे एक सच्चे समाज सुधारक थे। समाज में प्रचलित धार्मिक असमानताएं, आडंबर, आचार-व्यवहार एवं अंधविश्वास को खंडन करते थे । वे किसी भी धर्म के मूढ़विश्वास को खंडन करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं करते थे।
कबीरदास अपने दोहे में धार्मिक, आडंबरों का खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि अगर पत्थर की पूजा करने से भगवान मिल जाता है तो वह पहाड़ की पूजा करेंगे, लेकिन उससे भी चक्की कई अच्छी है। जिससे लोग आटा पीस कर खाते हैं। कबीरदास एक दोहे में कहते हैं कि - कुछ लोग पुण्य क्षेत्रों का संदर्शन करने के बाद अपने सर के बालों को मुंड़ते हैं ताकि पापों का प्रायश्चित हो सके। लेकिन ऐसे करने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि सभी कर्मों का मूलस्थान मन है। इसे साफ़ रखना चाहिए अर्थात विकृत विषयों से उसे शुद्ध करना चाहिए।
Comments
Post a Comment