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मातृ भाषा के प्रति


       1.मातृ भाषा के प्रति     -भारतेन्दु हरिश्चंद्र

📜प्रश्नोत्तर📜
1) भारतेन्दु हरिश्चंद्र  का कवि परिचय लिखिए ? 

ज) ✅ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850 - 6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह माने जाते हैं। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। ब्रिटिश राज की शोषक प्रकृति का चित्रण करने वाले उनके लेखन के लिए उन्हें युग चारण माना जाता है।भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर, 1850 को काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता गोपालचंद्र एक अच्छे कवि थे और 'गिरधरदास' उपनाम से कविता लिखा करते थे। 1857  में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु 7 वर्ष की होगी। ये दिन उनकी आँख खुलने के थे।  उनके पूर्वज अंग्रेज-भक्त थे, उनकी ही कृपा से धनवान हुये थे। हरिश्चंद्र पाँच वर्ष के थे तो माता की मृत्यु और दस वर्ष के थे तो पिता की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार बचपन में ही माता-पिता के सुख से वंचित हो गये। विमाता ने खूब सताया। बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था प्रथापालन के लिए होती रही। संवेदनशील व्यक्ति के नाते उनमें स्वतन्त्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत का विकास होने लगा। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उखड़ता रहा। क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कॉलेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा। स्मरण शक्ति तीव्र थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत। इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक - राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिन्द' थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी सीखी।
भारतेन्दु ने स्वाध्याय  संस्कृतमराठीबंगलागुजरातीपंजाबीउर्दू भाषाएँ सीख लीं।

 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार "भारतेन्दु अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो पद्माकर, द्विजदेव की परम्परा में दिखाई पड़ते थे, तो दूसरी ओर बंग देश के माइकेल और हेमचन्द्र की श्रेणी में। प्राचीन और नवीन का सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है।"



2) मातृ भाषा के प्रति  कविता का सारांश लिखिए ? 

ज) ✅ कवि परिचय :- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850 - 6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह माने जाते हैं। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। भारतेन्दु ने अंग्रेज़ी के साथ-साथ स्वाध्याय  संस्कृतमराठीबंगलागुजरातीपंजाबीउर्दू आदि भाषाएँ सीख लीं।
  • प्रस्तुत कविता के माध्यम से आपनी निज भाषा की महानता के बारे में बता रहे है

🔅 निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।.......  पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ॥


असल में उन्नति तभी होगी जब हमारे पढ़ने,सीखने,सोचने तथा अभिव्यक्त करने की भाषा हमारी अपनी भाषा हिंदी होगी। इसके बिना सारी प्रगति दिखाऊ होगी। अधूरापन अंदर ही अंदर सालता रहेगा शूल की चुभन बनके गले की फांसी  बन जाएगा । भले ही अंग्रेजी में शिक्षित- दीक्षित होने से आपको सर्व गुणी मान लिया जाएंगे।  लेकिन अपनी भाषा के ज्ञान के अभाव में आप एक हीन भावना से घिरे रहेंगे । खुद को दूसरे दर्जे के नागरिक मानेंगे। विजातीय भाषा पे गुमान कैसा है ? भले उसे बूझें।  पर अपनी भाषा ही आपको सर्वश्रेष्ठ बना सकती है। 

🔅 उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय । ........लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय ॥

भाषा हमारे शरीर की निर्मिति है । हमारे घर बाहर को संवारती है।  हमारी सोच का ,समझ का दायरा, संस्कारों का दायरा, हमारा परिवेश, हमारी अपनी ही भाषा हो सकती है।  इसके बिना हम अपने घर में ही पराए  होकर रह जाएंगे। अपनी नैजिक भाषा हिंदी में ही आप अपने पूरे परिवेश के साथ मुखर हो सकते हैं ।  इसके बिना आपको  उतनी  सुख समृद्धि आपको हासिल नहीं होगी । 

🔅 इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग । ....... निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ॥

जब सारे घर की  अपनी एक समुन्नत भाषा होगी, संवाद का पुल तभी बनेगा ,एक राय कायम होगी ,मूढ़ता का शोक जाता रहेगा। साफ़ तौर पर इसमें एक फायदा यह है - सीखी हुई तमाम बातें सारा ज्ञान अपनी  भाषा में ही आप अभिव्यक्त करेंगे। 

🔅 तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय ।.... सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ॥
आपके द्वारा निजभाषा में अभिव्यक्त ज्ञान का पूरा लाभ हर सुनने वाले तक  पहुंचेगा। सब देशों से सब प्रकार का वैविध्य पूर्ण ज्ञान-विज्ञान, ललित-कलाएं ,आत्मसात कर उसका प्रचार-प्रसार अपनी भाषा के श्रीवर्धन के लिए करो। 
🔅 भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात ।......  उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय॥

 एक ही देश में विविध मतान्तर  भाषाएँ परस्पर दूरी बनाये हुए हैं । इसीलिए सारा उपद्रव है ,आपस में लेन- देन मिलजुलकर  हो तो बात बने। आओ हम सब मिलजुलकर एक सर्व-स्वीकृत सर्व-संग्रही भाषा को समुन्नत करें।    

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