1.मातृ भाषा के प्रति -भारतेन्दु हरिश्चंद्र
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार "भारतेन्दु अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो पद्माकर, द्विजदेव की परम्परा में दिखाई पड़ते थे, तो दूसरी ओर बंग देश के माइकेल और हेमचन्द्र की श्रेणी में। प्राचीन और नवीन का सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है।"
- प्रस्तुत कविता के माध्यम से आपनी निज भाषा की महानता के बारे में बता रहे है
🔅 निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।....... पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ॥
असल में उन्नति तभी होगी जब हमारे पढ़ने,सीखने,सोचने तथा अभिव्यक्त करने की भाषा हमारी अपनी भाषा हिंदी होगी। इसके बिना सारी प्रगति दिखाऊ होगी। अधूरापन अंदर ही अंदर सालता रहेगा शूल की चुभन बनके गले की फांसी बन जाएगा । भले ही अंग्रेजी में शिक्षित- दीक्षित होने से आपको सर्व गुणी मान लिया जाएंगे। लेकिन अपनी भाषा के ज्ञान के अभाव में आप एक हीन भावना से घिरे रहेंगे । खुद को दूसरे दर्जे के नागरिक मानेंगे। विजातीय भाषा पे गुमान कैसा है ? भले उसे बूझें। पर अपनी भाषा ही आपको सर्वश्रेष्ठ बना सकती है।
🔅 उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय । ........लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय ॥
भाषा हमारे शरीर की निर्मिति है । हमारे घर बाहर को संवारती है। हमारी सोच का ,समझ का दायरा, संस्कारों का दायरा, हमारा परिवेश, हमारी अपनी ही भाषा हो सकती है। इसके बिना हम अपने घर में ही पराए होकर रह जाएंगे। अपनी नैजिक भाषा हिंदी में ही आप अपने पूरे परिवेश के साथ मुखर हो सकते हैं । इसके बिना आपको उतनी सुख समृद्धि आपको हासिल नहीं होगी ।
🔅 इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग । ....... निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ॥
जब सारे घर की अपनी एक समुन्नत भाषा होगी, संवाद का पुल तभी बनेगा ,एक राय कायम होगी ,मूढ़ता का शोक जाता रहेगा। साफ़ तौर पर इसमें एक फायदा यह है - सीखी हुई तमाम बातें सारा ज्ञान अपनी भाषा में ही आप अभिव्यक्त करेंगे।
आपके द्वारा निजभाषा में अभिव्यक्त ज्ञान का पूरा लाभ हर सुनने वाले तक पहुंचेगा। सब देशों से सब प्रकार का वैविध्य पूर्ण ज्ञान-विज्ञान, ललित-कलाएं ,आत्मसात कर उसका प्रचार-प्रसार अपनी भाषा के श्रीवर्धन के लिए करो।🔅 तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय ।.... सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ॥
🔅 भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात ।...... उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय॥
एक ही देश में विविध मतान्तर भाषाएँ परस्पर दूरी बनाये हुए हैं । इसीलिए सारा उपद्रव है ,आपस में लेन- देन मिलजुलकर हो तो बात बने। आओ हम सब मिलजुलकर एक सर्व-स्वीकृत सर्व-संग्रही भाषा को समुन्नत करें।
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